संपादकीय - कहते हैं सावन का महीना रूठे हुओं को मनाने का होता है । सम्पादक तो हमेशा दिल तोड़ने का ही काम करता है। वह एक बार जोड़ भी ले तो फिर टूटने का ख़तरा मँडराता है। मेरी स्थिति तो साँप-छछूदर जैसी है।न निगलते बनता है, न उगलते बनता है। ऊपर का संपादक उगलने का आदेश देता है तो भीतर का कवि निगलने का आग्रह करता है। उहापोह की स्थिति न आगे बढ़ने देती है, न पीछे हटने देती है। रस्सी के पुल पर चल रहा हूँ। हौसले की लम्बी लाठी के सहारे कभी इधर होता हूँ, कभी उधर होता हूँ। कब तक संतुलन रख पाता हूँ, ऊपर वाला जाने चेहरे पर मुस्कुराहट सिर्फ इसलिये है- कि उम्मीद है गिरूंगा तो आप मुझे बाँहों में झेल लेंगे। मगर नहीं जानता कि आप इस स्थिति में हैं या नहीं? बहरहाल, कोशिश है कि धड़ाम से नीचे गिरने की नौबत न आये । यह पहले भी जारी थी, अभी भी जारी है।
वैसे सोचता हूँ जब पशु-पक्षी यह काम (रूठने-मनाने का) बड़ी शिद्दत से करते हैं तो फिर, हम तो पढ़े-लिखे, भारी साक्षर और अधिकतम बुद्धिमान लोग हैं। साथ ही साहित्यकार का बेज भी सीने पर लगाये हैं। ऊपर से संवेदनशीलता का पेटेंट भी हमारे नाम है। मतलब, यह काम हम और भी सलीके से कर सकते हैं। मगर होगा तभी जब हम चाहेंगे, अपने अहम को कई फीट नीचे ज़मीन में गाड़ देंगे, झूठ-मूठ की ओढ़ी हुई पदवियों का परित्याग करेंगे, मानसिकता में भी समय के हिसाब से थोड़ा बदलाव लायेंगे।
मेरा स्पष्ट मानना है कि अलग-अलग धारा में बहने वाले सृजनधर्मियों संपादकीय मेरा स्पष्ट मानना है कि अलग-अलग धारा में बहने वाले सृजनधर्मियों को राष्ट्रीय-धारा के मुद्दे पर एक होना चाहिये। एक होना ही पड़ेगा। अगर गन्तव्य के लिये घर छोड़ा है तो अलग-अलग गलियों से गुज़र कर मुख्य सड़क पर आना ही होगा । यह वह मार्ग है जहाँ से आपकी गति रफ्तार पकड़ेगी। सच कहें तो यही समाज की मुख्य धारा का सफ़र है। ऐसा नहीं करेंगे तो घृणा-ईर्ष्याद्वेष की अग्नि में सब कुछ स्वाहा... स्वाहा होता रहेगा। हम स्वयं इस आग में ज़िन्दा जलते रहेंगे और तीलियाँ दिखाने के अपराधी बनते रहेंगे जलना ही है तो पश्चाताप की आग में जला जाये और खूबसूरत प्रायश्चित के साथ मनोरम यात्रा की शुरुआत की जाये। हालाकि इलाज की यह कड़वी गोली है । जीभ पर रखी नहीं जाएगी। रख ली तो, गले में उतरेगी नहीं। उतर गई तो पचेगी नहीं।
मगर स्वस्थ होने के लिये इसका पेट में जाना ज़रूरी है। आप मानें या न मानें, सावन है तो हम आपको मनायेंगे ज़रूर• आगे बढ़ने से पहले आइये थोड़ी आपसी चर्चा कर लेता हूँ। लोग कहते हैं राजनीति का साहित्य से कुछ लेना- देना नहीं है। मैं कहता हूँ सिर्फ कविता में जुगाली करने वाले इस बात को क्या जाने? राजनीति का सीधा-सीधा रिश्ता चुनाव से है। चुनाव का सीधा रिश्ता आचार संहिता से है। आचार-संहिता का सीधा रिश्ता सरकारी विज्ञापन पर रोक से है। विज्ञापन पर रोक का सीधा रिश्ता पत्रपत्रिकाओं की अकाल मौत से है और पत्र-पत्रिकाओं की मौत का सीधा रिश्ता- साहित्यकारों की श्वाँस-नली कट जाने से हैअब समझ लीजिये आपकी ज़िन्दगी किसके हाथ में है? गीत गागर वह पेड़ है जिस पर बैठकर आप कलरव करते हैं।'
पत्रिकाओं की प्राणवायु है विज्ञापन विज्ञापन नहीं तो पत्रिका के अगले अंक का मुंह देखना भी नसीब नहीं होगा पाठकों को, अपनी लेखनी पर इतराने वाले रचनाकारों को। मछली और पानी का रिश्ता है ये। बादल और नदी का रिश्ता है ये। साहित्यकार तो ऑक्सीजन बन कर कभी आते नहीं। वे तो सिरहाने बैठकर देखभाल भी नहीं कर सकतेकुछ तो हाल-चाल पूछने का जोखिम भी नहीं उठाते।कुछ अस्पताल में भी स्वागत-सत्कार चाहते हैं। कवियों में सभी तो डॉ. शिवओम अम्बर नहीं होते। अधिकांश को बस अपने घोंसले से मतलब है, पेड़ से नहीं। वे नहीं जानते कि पेड़ सुरक्षित है तो उनका घोंसला सुरक्षित है। उनका घोंसला सुरक्षित है, तो उनकी उड़ान सुरक्षित है।
पूरा देश चुनाव के उल्लास में मगन था तो साहित्यिक पत्रिकाएँ 'विज्ञापन पर प्रतिबन्ध' का अभिशाप झेल रही थींआखिर साहित्यिक पत्रिका निकालने वाला भी तो एक साहित्यकार ही होता हैकोई पूँजीपति या उद्योगपति तो होता नहीं। द्वार पर खड़ी इस अकाल मृत्यु के साक्षात दर्शन 'गीत गागर' ने पिछले छः माह में दो बार किये हैंविधानसभा और पत्रिकाओं से 'मुक्त' होने का साक्षी बना है, इसलिये 'गीत गागर' को भी इतराने की कोई आवश्यकता नहींपत्रिकाएँ कम ही दीर्घायु होती हैं। फिर भी अच्छा हो हम चिता को लकड़ी देने के बजाय, मरीज के स्वस्थ होने में मदद करें। 'गीत गागर' एक छतरी है। बारिश से बचना चाहते हैं तो स्वागत है। मगर टूटेगी तो उसकी तानें भी जुड़वाना पड़ेंगी, उड़ेगी तो उसे कसकर पकड़ना भी पड़ेगादेश ने फिर से मोदी जी पर आस्था जतायी है तो कृपया, आप भी इस प्रिय पत्रिका पर अपने विश्वास का बटन दबायें। इसके फूलने-फलने में सहयोगी बनें । आखिर फल भी तो आपके ही हिस्से में आने हैं।
आने के बावजूद भी कुंडी नहीं खोली, उनकी देहरी पर इसने पाँव रखना छोड़ दिया है। फिलहाल, उक्त दोनों कठिन दौर में हमने पत्रिका को मुस्कुराने की मुद्रा में रखा हक़ीक़त यह थी कि उसकी आँखें आँसुओं से तरबतर थीकहने का मतलब यही है कि मत कहियेगा कि फलाने का फलाने से क्या रिश्ता है? ढिकाने का ढिकाने से क्या रिश्ता है? गहराई में जायेंगे तो सबका सबसे कुछ न कुछ रिश्ता निकलता है। हम सब लोकतन्त्र में जीते हैं, सामाजिक लोग हैं, राजनीतिक व्यवस्था में पलते-बढ़ते हैं, एक दूसरे में गुत्थमगुत्था हैं। कैसे अलग हो सकते हैं? गीत गागर आपसे जुड़ने के लिए व्याकुल है। वह टकटकी लगाकर देखती हैआप यदि उसे बाँहों में भरेंगे तो उसकी कृतज्ञता आपको बहुत सुकून देगी।
निवेदन सिर्फ इतना है कि देश अच्छी-अच्छी पत्रिकाओं से 'मुक्त' होने का साक्षी बना है, इसलिये 'गीत गागर' को भी इतराने की कोई आवश्यकता नहींपत्रिकाएँ कम ही दीर्घायु होती हैं। फिर भी अच्छा हो हम चिता को लकड़ी देने के बजाय, मरीज के स्वस्थ होने में मदद करें। 'गीत गागर' एक छतरी है। बारिश से बचना चाहते हैं तो स्वागत है। मगर टूटेगी तो उसकी तानें भी जुड़वाना पड़ेंगी, उड़ेगी तो उसे कसकर पकड़ना भी पड़ेगादेश ने फिर से मोदी जी पर आस्था जतायी है तो कृपया, आप भी इस प्रिय पत्रिका पर अपने विश्वास का बटन दबायें। इसके फूलने-फलने में सहयोगी बनें । आखिर फल भी तो आपके ही हिस्से में आने हैं। • अब मूल मुद्दे पर... तीन महीने का अन्तराल बहुत होता है। 'गीत गागर' का जब तक नया अंक आता है तब तक बहुत कुछ उलट-पुलट हो जाता है। देश कई स्थितियों से गुज़र जाता हैहम भी कई ऋतुओं, मौसमों और त्योहारों से गुज़र जाते हैं । लिखते-लिखते भी बहुत कुछ हो रहा है और छपतेछपते भी बहुत कुछ हो जाना है। समय को पकड़ना बहुत मुश्किल हैइसलिये लेखनी को ताजा बनाये रखना भी कठिन काम है।
पिछले दिनों लोकतन्त्र का महापर्व सम्पन्न हो गया। चौकीदार फिर ड्यूटी पर आ गया। मूंछों पर ताव देते हुएसीना फुलाते हुए। किसी का सामान जब चोरी ही नहीं हुआ तो चौकीदार को कैसे भगाते? पहली बार कोई चुनाव साफ-सुथरा आईना बना जो जैसा था, वैसा दिखा । लोगों को अपने चेहरे के दाग-धब्बे देखने में परेशानी नहीं हुई |
बदतमीजी परास्त हो गई। गालीबाज चारों खाने चित्त हो गये। मुंगेरीलालों के सपने टूट-फूट गये । खुद को दरोगा बताने वालों की वर्दी उतर गई। चोर का चौराहे पर अभिनंदन हुआ। आरोपी को फूलमाओं से लाद कर लोग झूम उठे। हर कोई खुश, हर कोई हतप्रभ । पूरे देश को मूर्ख समझने की हिमाकत का एक स्वाभाविक परिणाम सामने आया। कमाल का नजारा थाचौकीदार उर्फ चायवाला धड़ल्ले से लाठी पकड़े था सारी बाधाएँ उसने चुटकियों में पार कर लीचोर बाइज्जत बरी हो गया ।जनता ने उसे काँधे पर उठा लिया |चहेतों ने उसे फूलों से लाद दिया |बूढ़ी माँ ने उसके गालों को चुम्बनों से भर दिया संसद ने उस बेटे को फिर गोदी में बिठा लिया जिसने पाँच वर्ष पहले उसकी सीढ़ी पर माथा टेका था। अब दूसरा दृश्य भी देख लीजिये
गाली-गेंग साफ। टुकड़ा-टुकड़ा गिरोह छूमंतर। गद्दारों का गुरुकुल ध्वस्त । गाल बजाने वाले उड़न छू। बहिन जी (उर्फ बुआ जी) चित । दीदी औंधे मुँह । भतीजा भौचक्का। सफारीधारी वेन्टीलेटर परराजा-महाराजा कोमा में। शत्रु आई.सी.यू. मेंचाणक्य हक्के-बक्के। बुद्धिजीवी बदहवास पंडित-ज्योतिषी हतप्रभ । झंडाबरदार मूर्छित हवा बाँधने वाले फरारअफ़वाहबाज भूमिगत। पत्थरबाज बंकर में। अब आप ही बताइये ये खूबसूरत भविष्य का चयन नहीं तो और क्या है? यह अटूट विश्वास का बटन नहीं तो और क्या है? लोकतन्त्र के इस पर्व ने यह बताया कि उज्जड दिमाग, उच्छृखल प्रवृत्ति, उचक्की मानसिकता, उद्दण्ड स्वभाव तथा घटिया सोच वालों को यह देश तनिक भी बरदाश्त नहीं करता तथा स्वच्छ आचरण, धवल चरित्र व ईमानदार छवि वाले वरिष्ठों का अपमान करने वालों को सख्त सजा देता हैकश्मीर में यदि सेना 'ऑपरेशन ऑल आउट' चला रही थी तो यही काम पूरी मुस्तैदी के साथ चुनाव में देश की जनता कर रही थी। फर्क सिर्फ इतना था कि उधर ट्रिगर दब रहे थे, तो इधर बटन दब रही थीतिलमिलाहट की पराकाष्ठा, खिसियाहट का चरम और घबराहट का सैलाब इस कदर था कि इन्सान को भ्रष्ट बताते-बताते मशीन को भी चरित्रहीन बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई |
असभ्यता की सुनामी इस कदर थी कि कोई देश के प्रधानमंत्री को थप्पड़ मार रहा था । कोई देश से निकाल ज़रूर फेंक दियादेश की जनता ने साबित किया कि वह अब पहले की तरह बुद्ध नहीं रही। वह गणित से ज्यादा केमिस्ट्री समझती है।जो दल इसके साथ अपनी केमिस्ट्री बैठा लेता है उसकी नैया पार हो जाती है। उसमें बेहतर विकल्प चुनने की क्षमता आ गई है। भारी-भरकम धनुष तोड़ने के चक्कर में सारे राजा-महाराजा अपने हाथ धनुष के नीचे दबा बैठे और जयमाल किसी और के गले में डल गयी । स्वयंवर इनके लिये चक्रव्यूह बन गया। कुल मिलाकर पूरे देश ने इस फिल्मी गाने का भरपूर आनन्द लिया- 'शिकार करने को आये, शिकार होके चले'।
इस चुनाव ने यह भी बताया कि ग्रामीण जनता सीधी जरूर है, किन्तु गेबली नहीं है। लोमडी हिरण को फँसाने के लिये षडयन्त्र तो रच सकती है लेकिन उसे मरवा नहीं सकतीउल्टे खद किसान की कल्हाडी का शिकार होना उसकी नियति होती है। पहली बार जातिवाद और अगड़े-पिछड़े की राजनीति से ऊपर उठकर सारे देशवासी सच्चे हिन्दुस्तानी हुए। सच्चे भारतीय हुए सच्चे राष्ट्र भक्त हुएसच्चे संविधान-प्रेमी हुए। सच्चे लोकतन्त्र के पुजारी हुए । राष्ट्र सर्वोपरि के प्रति आस्था व्यक्त करते हुए उसने अपनी परिपकता की मिसाल कायम की हैइस चुनाव से एक संदेश और निकल कर आया
इस चुनाव से एक संदेश और निकल कर आया सारे विपक्षियों की बात को अनसना करकेयवाओं ने दिखा दिया है कि हमें बेरोजगारी मंजूर है लेकिन हमारे सैनिकों पर पत्थरबाजी मंजूर नहीं। किसानों ने दो-टूक कह दिया हमें सूखा, ओलावृष्टि, कम दाम सब स्वीकार है मगर अपनी धरती के खिलाफ कोई षडयन्त्र स्वीकार नहीं। आम आदमी ने साफ-साफ जतला दिया हमें महँगाई-भूखगरीबी सब मंजूर है लेकिन देश का टुकड़ा-टुकड़ा होना हरगिज पसंद नहीं। गरीबों ने इशारा कर दिया कि यदि सीमा सुरक्षित है और देश के मुखिया की नीयत साफ है तो हम दुनिया में सबसे बड़े अमीर हैं। तथ्य यही निकला कि हमारे ग्रामवासियों का जितना भावनात्मक लगाव अपने खेतों से है, उतना ही लगाव अपनी मातृभूमि से भी है। खेतों से है ना देशहित में जनता-जनार्दन ने कन्हैया कुमार जैसे विषैले पौधे को जड़ से उखाड़ कर फेंक दिया। अनेक आतंक-समर्थक, देशविरोधी, पाक-परस्त, सत्ता लोभी, ढोंगी, पाखंडी नेताओं को कूड़े के ढेर में पटक दिया। हाँ, एक दो सपोले ज़रूर रेंगते हुए, जबड़े में ज़हर की थैली लिए, संसद हाल में पहुँच गये। किंतु दाँत इनके भी टूट चुके हैं। पूँछ फटकार कर ही ये अब अपने जिंदा होने का सबूत देते रहेंगेकुल मिलाकर सारे विपक्षी दल ऐसे प्रेमी निकले
कुल मिलाकर सारे विपक्षी दल ऐसे प्रेमी निकले जिसे सत्ता-सुन्दरी ने फूटी-आँखों देखना पसंद नहीं किया। वे ठुड्डी पर हाथ रखकर, मुँह पकड़-पकड़ कर उसे अपनी ओर घुमाते रहे, मगर वह नाक-भौं सिकोड़ कर दूसरी तरफ मुँह किये रही। परेशान नेताओं को इस बार मतदाताओं ने खूब चकमा दियाभीतर के तूफान को वे नकली शांति से ढंकते रहे 'साइलेंट वोटिंग' विरोधियों के लिये 'स्लोपाइजन' साबित हुई 'अन्डर करंट' ने ई.वी.एम. में प्रवेश कर सारे विरोधियों को 440 वोल्ट का झटका दे दिया'ऑपरेशन बालाकोट' के विरोधियों को सीधा 'पातालकोट' पहुंचा दियायह भी साफ हो गया कि जिन मुद्दों को विरोधियों ने हथियार के रूप में इस्तेमाल किया, वही सामने वाले के लिये रक्षा-कवच सिद्ध हुएदेश के गरीब व मध्यम वर्ग ने नोटबंदी व जी.एस.टी. को वरदान माना तथा अटूट बहुमत देकर चाय वाले को फिर से राज करने का वरदान दे दिया ।रफैल का दाँव भी फेल कर दिया। • बहरहाल, यह एक बड़ा यज्ञ था जो सम्पन्न हो गया। इतने बड़े घटनाक्रम को यदि हम संज्ञान में नहीं लेते तो हम अपने दायित्व के प्रति बेईमान कहे जाते ।शायद लोकतन्त्र, देश व समाज हमें क्षमा नहीं करता। इस यज्ञ में कैसे कैसे हवन हुए? क्या क्या आहुतियाँ दी गई? कौन कौन स्वाहा हुए? कैसे कैसे धुआँ हुए? ये सब अचंभित करने वाला है। लेकिन हमें राजनैतिक दलों, नेताओं, गठबंधनों, महा गठबंधनों, ठगबन्धनों, खुराफातियों के स्वाहा होने की चिंता नहीं है। हमें चिंता इस बात की है कि इसमें माँ सरस्वती के अनेक वरेण्य पुत्रों, अभिनेताओं, नाटककारों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, प्रवक्ताओं, अधिवक्ताओं की गहन आराधना-साधना धूं-धूं कर जल गई। किसी को हराने- जिताने के लिये उन्होंने कागज पर कागज रंग डाले। कविताएँ रच डालीं। शायरों के शेर दहाड़ने लगे । अख़बारों में स्तंभ लिख डाले । टी वी चैनलों में बहसें दीं। बहसों में पत्थरबाजी, लप्पड़बाजी, नई नई चलवा दीं। बहसों में पत्थरबाजी, लप्पड़बाजीगालियों का आविष्कार हुआ । कवियों में युद्ध छिड़ गया। किन्तु उनके सारे धत्करम धरे के धरे रह गये । लगता है सबके सब राजनीति की रेल में बेटिकिट सवार हो गये और बेशर्मी के साथ ए.सी. कोच में चढ़ गए । बेइज्जत तो होना ही था ।शक्ल दिखाने लायक भी नहीं रहे
जितनी ताकत साहित्यकार के पास होती है उतनी तो सरहद के सिपाही के पास भी नहीं होती। उसे तय करना होगा कि इस शक्ति का इस्तेमाल वह कहाँ करना चाहता है? जोर दे-देकर कहा जाता है कि लेखक को पीडित-शोषित के साथ खड़ा होना चाहिये । किसने इसका विरोध किया? कौन इसे स्वीकार नहीं करता? लेखक तो स्वयं सबसे बड़ा शोषित वर्ग का प्रतिनिधि है। कितने करोड़पति लेखक हैं देश में- जिन्हें भख. गरीबी. महँगाई नहीं सताती? लेकिन चीख-चीख कर यह कौन कहेगा कि लेखक को सच के साथ भी (ही) खड़ा होना चाहिये । हमें तो डॉ. शिवमंगल सिंह 'सुमन' ने घोंट-घोंट कर, उबाल-उबाल कर यह काढ़ा पिलाया है। साहित्यकार फटेहाल है तो क्या सच कहना और सच का साथ देना छोड़ दे?
याद रखिये, जो सबसे ज्यादा पीड़ितों के हक़ की बात करते हैं वही वास्तविक जीवन में उनके प्रति सबसे अधिक असंवेदनशील होते हैं। क्या आपने ऐसे तथाकथित साहित्यकरों को किसी गरीब के आँसू पोछते देखा? जो सर्वाधिक मजदूर की बातें करते हैं वे उसके घर कभी झाँकने भी गए? जो सबसे अधिक उदारवादी बनते हैं वही सबसे अधिक कट्टरता को जीते हैं। जो रोज सहिष्णुतासहिष्णुता का राग अलापते हैं वही असहिष्णुता की सबसे बड़ी मिसाल हैं। हमारा साहित्य-जगत तो इन बीमारियों से भरा पड़ा है। वामपंथी इसमें सिरमौर हैं। वे समाज में कट्टरता के कैप्सूल बाँटते हैं और उन्हें पैनकिलर का नाम देते हैं। धर्मनिरपेक्षता का दुशाला ओढ़ने वाले लेखक/कवि भी उतने ही दागदार हैं। दरअसल नशे में आदमी सच भले ही बोल दे, सच लिख नहीं सकताआज साहित्य का अधिकांश गलियारा एक बेमिसाल पाखंड एवं उच्चकोटि के ढोंग से गुजर रहा है। कुछ लेखकों की नज़र में अपराधी, लुटेरे, नक्सली, हत्यारे, आतंकी 'सहिष्णु' हैं और पीड़ितों को इनसे मुक्त करने वाली सरकार, सेना, पुलिस असहिष्णु' है 'टाइम' पत्रिका का 'यू टर्न' क्या दर्शाता है? 'असहिष्णु' है 'टाइम' पत्रिका का 'यू टर्न' क्या दर्शाता क्या यह देश के प्रधानमंत्री पर अत्याचार नहीं था? इस गिरगिटपन व निर्लज्जता पर बुद्धिजीवियों व कथित साहित्यकारों को साँप सूंघ गया ।वे गूंगे हो गये।
साहित्यकार हो या सरकार, अच्छे काम के लिये प्रशंसा पाना हर किसी का अधिकार है, भूख भीआप कविता पढ़ते हैं तो दाद क्यों चाहते हैं? एक-दो लाइनें पढ़ने के बाद ही तालियाँ क्यों माँगते हैं? दो-चार कविताएँ लिखने के बाद ही क्यों सम्मान की अपेक्षा करने लगते हैं? गिनी- चुनी कवि गोष्ठियों में भाग लेते ही क्यों आपमें महान कवि की आत्मा जागने लगती है? फेसबुक पर कमेण्टस्/लाइक्स पाकर कितना खुश होते हैं आप? सड़ी कविता पर भी बड़ी तारीफ...! क्या यह अनुचित अपेक्षा नहीं? हमारा स्पष्ट दृष्टिकोण है कि हर अच्छे कार्य को खुले मन से सराहा जाना चाहिये और हर ग़लत कार्य पर सलीके से उँगली उठानी चाहिये। नहीं क्यों संकटकाल में देश के रहनुमाओं को आज के साहित्यकारों में मसीहा की शक्ल नजर आती हैहक़ीकत यह है कि सबके अपने-अपने झण्डे-बैनर हैं। अपने-अपने दल हैंउनके अपने-अपने आका हैं। अपने- अपने स्वार्थ हैं। अपने-अपने लक्ष्य हैं। देश उनकी सूची में कहीं नहीं हैइन सबकी एक आँख में हरी पट्टी बँधी रहती है। तभी तो ये कहते हैं- 'पूरा देश रसातल में चला गया। सारे धंधे चौपट हो गये। सारी नौकरियाँ छिन गई। गरीबों के नोट हड़प लिये। किसानों को मार डाला गया। आम __ आदमी को पीस दिया गया। उद्योगपतियों की जेबें भर दी गई। माल्या-मोदी को भगा दिया गया।' मतलब चौकीदार सिर्फ और सिर्फ़ चोरी के लिये ही जनता द्वारा नियुक्त किया गया थाअरे! आप जिंदा कैसे हैं? पेट में रोटी नहीं है तो उँगलियाँ कैसे चल रही हैं कागज पर. मोबाइल पर. कम्प्यूटर पर, लैपटाप पर? जबान कैसे चल रही है? देश में कोई सुहाना मौसम है ही नहीं? इन्हें पता ही नहीं कि बड़ी कोई सुहाना मौसम है ही नहीं? इन्हें पता ही नहीं कि बड़ी बीमारियों को समाप्त करने के लिये बड़ा इलाज करना पड़ता है। कैंसर का इलाज करने पर खोपड़ी के बाल तक झड़ जाते हैं और गले की चमड़ी तक जल जाती है। ईश्वर की कृपा से हमारा देश इस हालत से तो नहीं गुजरा। फिलहाल तो वह भला-चंगा है
सच तो ये है कि सरकार और साहित्यकार दोनों राष्ट्र की आत्मा होते हैं। दोनों के गन्तव्य और मन्तव्य में कोई फर्क नहीं। एक का काम देश को सँवारना है, तो दूसरे का काम समाज को सँवारना है। अफसोस यही है कि शीर्षासन वाली इस सदी में अलग-अलग दलों की सरकारें देश को बाँटने में लगी हैं, अलग-अलग विचारधाराओं में बँटे रचनाकार समाज को बाँटने में लगे हैं। सरकारों को वोट की राजनीति भाती है, साहित्यकारों को स्वार्थ की नीति सुहाती है। सरकारें तुष्टिकरण में व्यस्त हैं, सरस्वतीपुत्र चारणगिरी में मस्त हैं। कोई किसी के कंधे पर चढ़ा हुआ है, कोई किसी की गोद में बैठा हुआ है। दोनों पर पागलपन सवार है।अब आखिरी बात, जीतने वालों से दो टूक अब आखिरी बात, जीतने वालों से दो टूक देशवासियों ने आपके गले में सिर्फ मालाएँ डाली हैं। देश के नाम का पट्टा नहीं डाला (लिखा)। कुर्सी का मालिकाना हक़ भी नहीं दिया। इनके एक-एक फूल में आशाएँ, एकएक पंखुड़ी में अपेक्षाएँ छिपी हैं। 'विश्वासघात' होने पर यही फूलमालाएँ फन्दा भी बन सकती हैं । वादाख़िलाफी भी किसी राष्ट्रद्रोह से कम नहीं। तय आपको करना है।
पता है इस बार का संपादकीय बहुत लोगों को तकलीफ देगा मेरी अपनी प्रिय कवि-बिरादरी को भी रुष्ट करेगा पर सच मानिये स्पष्ट बोलने का अर्थ शत्रुता को पालना या द्वेष को जन्म देना कदापि नहीं होता। कटुता और वाकपटुता में बहुत अन्तर होता है। मैं तो घाव देने और फिर मरहमपट्टी जैसे कर्मकाण्ड में विश्वास ही नहीं करता। इलाज से ज्यादा मैं बचाव में यकीन रखता हूँ। बस बचपन से एक अटूट भावना है- राष्ट्र सर्वोपरि... प्रेम सर्वोपरि
मैंने अपनी बात सावन से शुरू की थी। उसी सावन का फिर से हवाला देकर (सौगन्ध खाने की आदत नहीं)मैं अपने सभी रूठे हुओं को मनाना चाहता हूँ। दिल से मनाना चाहता हूँ। आप सबके चरणों में अपनी ये चार पंक्तियाँ रखकरनदिया नाले पूर, झमाझम बारिश में साजन! तू क्यों दूर, झमाझम बारिश में कई दिनों से प्रेम-याचिका लंबित है अब तो कर मंजूर, झमाझम बारिश में चिट्ठी लिखेंगे न? मैं इन्तज़ार करूंगा। इस बार लंबे संपादकीय के लिये क्षमा चाहता हूँ।